श्रीराम द्वारा सीता का दान


श्रीराम द्वारा सीता का  दान


अश्वमेघ यज्ञ के दौरान श्रीराम ने घोषणा की कि यदि कोई व्यक्ति अयोध्या का राज्य, पुष्पक विमान, कौस्तुभ मणि, कामधेनु गाय या सीता को मांगेगा तो मैं उसे दे दूंगा। यज्ञ की समाप्ति हुई। फिर श्रीराम ने अपने गुरु वशिष्ठ को चिंतामणि और कामधेनु को दान करने की तैयारी की। 

वशिष्ठजी के मन में आया कि यदि मैं एक अपूर्व लीला कर श्रीराम की उदारता का प्रदर्शन कराकर उनकी कीर्ति अक्षय कर दूं तो..! ऐसा विचार कर वे बोले- राघव, इस गोदान से मेरी तृप्ति नहीं होगी, तुम्हें देना ही हो तो सभी प्रकार के आभूषणों से सज्जित सीता को दान करो। यह सुन प्रजा में हाहाकार मच गया।

इसी बीच श्रीराम ने हंसकर सीताजी को बुलाया और उनका हाथ पकड़कर कहने लगे, हां अब आप स्त्री दान का मंत्र बोलें। मैं सीता को दान कर रहा हूं। वशिष्ठ ने यथाविधि इसका उपक्रम कर दिया। सभी लोग चकित रह गए। इसके बाद श्रीराम ने वशिष्ठ को कामधेनु गाय भी लेने का आग्रह किया, तब वशिष्ठ बोले- श्रीराम मैंने तो तुम्हारी उदारता के प्रदर्शन के लिए यह कौतुहल रचा था।

अब तुम सीता का आठ गुना सोना तौलकर इसे वापस ले लो और आज से मेरी आज्ञा से कामधेनु, चिंतामणि, कौस्तुभ मिण, सीता, पुष्पक विमान, अयोध्यापुरी तथा संपूर्ण राज्य किसी को न देना। इन सातों के अतिरिक्त तुम जो चाहो दान करना। श्रीराम ने गुरु की आज्ञा मानकर यज्ञ की शेष प्रक्रिया पूरी की। सार यह है कि धर्मसंकट की स्थिति में भी धर्य रखने से सही निर्णय लेने की क्षमता उत्पन्न होती है और सही निर्णय सकारात्मक परिणाम देता है।