दोबारा हुआ द्रोपदी का भरी सभा में अपमान


दोबारा हुआ द्रोपदी का भरी सभा में अपमान

पांडवों को मत्स्यदेश की राजधानी में रहते हुए दस महीने बीत गए। यज्ञसेन कुमारी द्रोपदी भी वहां दासी की तरह रहने लगी। जब एक वर्ष पूरा होने में कुछ ही समय बाकी रह गया मत्स्यनरेश का साला कीचक अपनी बहन से मिलने आया। तब उसकी नजर महल में काम करती हुई द्रोपदी पर पड़ी। द्रोपदी की अद्भुत सुंदरता देखकर वह मुग्ध हो गया। उसने अपनी बहन से कहकर राजकुमारी द्रोपदी के पास आकर बोला- कल्याणी! तुम कौन हो? कहां से आई हो? सुंदरी अगर तुम चाहो तो मैं अपनी पहली स्त्रियों को त्याग दूंगा। उन्हें तुम्हारी दासी बनाकर रखूंगा।

बस तुम मेरी रानी बन जाओ। द्रोपदी ने कहा मुझसे ऐसा कहना उचित नहीं है। संसार के सभी प्राणी अपनी स्त्री से प्रेम करते हैं, तुम धर्म पर विचार कर ऐसा ही करो। मेरे पति गंधर्व हैं।उन्हें अगर ये बात पता चली तो वो आपको जीवित नहीं रहने देंगे। द्रोपदी के इस तरह ठुकराने पर कीचक कामसंप्तत होकर अपनी बहन सुदेष्णा के पास जाकर बोला- बहिन जिस उपाय से भी सौरंध्री मुझे स्वीकार करे, सो करो नहीं तो मैं उसके मोह में अपने प्राण दे दूंगा। तब उसकी बहिन ने उसे समझाते हुए कहा मैं सौरंध्री को एकांत में तुम्हारे पास भेज दूंगी। 

कुछ समय बाद रानी सुदेष्णा ने सौरंध्री को अपने पास बुलाकर कहा मुझे बहुत जोर से प्यास लग रही है। तुम कीचक के आवास पर जाओ और कुछ पीने योग्य लेकर आओ।तब द्रोपदी कीचक के महल में डरते-डरते गई। कीचक ने जब उसे देखा तो वह अपने आप को रोक नहीं पाया उसने द्रोपदी की तरफ बढऩे का प्रयास किया। कीचक का तिरस्कार कर द्रोपदी जब वहां से भागने लगी। कीचक ने भी उसका पीछा किया और भागती हुई द्रोपदी के केश पकड़ लिए। फिर राजा के सामने ही उसे जमीन पर गिराकर लात मारी। उस समय राजसभा में युधिष्ठिर और भीमसेन भी बैठे थे।