कृष्ण के लिए गोपियों ने दी चरणरज


कृष्ण के लिए गोपियों ने दी चरणरज


भगवान श्रीकृष्ण की पटरानियां प्राय: ब्रज की गोपियों के प्रेम का परिहास करते हुए स्वयं के प्रेम को श्रेष्ठ बताती थीं। उनके अहंकार को भंग करने के लिए श्रीकृष्ण ने एक युक्ति सोची। वे बीमारी का बहाना बनाकर लेट गए, तभी नारदजी आए। वे श्रीकृष्ण का उद्देश्य समझकर बोले- प्रभु के रोग की औषधि तो है किंतु वह उनके किसी प्रेमी भक्त की चरणरज का सेवन है।

क्या आप में से कोई अपनी चरणरज देगा। रुक्मिणी, सत्यभामा आदि सभी पटरानियों ने इंकार कर दिया। तब श्रीकृष्ण ने नारद को ब्रज जाकर गोपियों से आग्रह करने के लिए कहा। नारदजी श्यामसुंदर के पास से आए हैं, यह सुनकर सभी गोपियां दौड़ पड़ीं। जब नारदजी ने श्रीकृष्ण की बीमारी की बात बताई तो उन सभी के प्राण सूख गए।

औषधि के विषय में पूछने पर नारदजी बोले- संपूर्ण जगत में चक्कर लगा आया पर व्यर्थ ही रहा। गोपियों ने पूछा- क्या वह औषधि हमारे पास भी है? नारदजी से उस औषधि के विषय में जानने के बाद गोपियों ने अपनी चरणरज देने पर सहमति जाहिर की। तब नारदजी ने कहा- क्या तुम यह नहीं जानतीं कि श्रीकृष्ण भगवान हैं। भला उन्हें खाने को अपने पैरों की धूल, क्या तुम्हें नर्क का भय नहीं। तब गोपियां बोलीं- हमारा सब कुछ हमारे प्रिय श्रीकृष्ण हैं।

हम उन्हें स्वस्थ कर सकें इसके लिए हमें नर्क भी स्वीकार हैं। नारदजी ने उन सभी की चरणरज की पोटली बांधी और आकर श्रीकृष्ण को दी। यह देख पटरानियां, गोपियों की प्रेम की महानता के समक्ष नतमस्तक हो गईं। वस्तुत: निर्मल प्रेम छोटे-बड़े का भेद नहीं देखता। अपनापन और निष्ठा देखता है। सच्चे प्रेम में अहंकार व अधिकार भाव नहीं, मात्र समर्पण होता है।