प्रेमभरी मुस्कान से श्रीकृष्ण ने राक्षस को किया निस्तेज


प्रेमभरी मुस्कान से श्रीकृष्ण ने राक्षस को निस्तेज किया


एक बार बालक श्रीकृष्ण, बलराम और सात्यकी घने जंगल में भटक गए। अंधेरा हो गया। गोकुल पहुंचने का कोई मार्ग नहीं दिख रहा था। अत: उन्होंने जंगल में ही रात बिताना तय किया। उन्होंने योजना बनाई कि सभी बारी-बारी से पहरा देंगे। सबसे पहले सात्यकी पहरा देने लगा और बलराम व श्रीकृष्ण सूखी घास-फूस का बिछौना बनाकर उस पर सो गए। इसी बीच सात्यकी के सामने एक राक्षस आ गया और सात्यकी पर टूट पड़ा। 

सात्यकी ने साहसपूर्वक उसका सामना किया। अंत में राक्षस सात्यकी की बुरी तरह पिटाई करके चला गया। किंतु सात्यकी प्रसन्न था। बलराम और श्रीकृष्ण सोते रहे। राक्षस और सात्यकी के बीच हुए संघर्ष के कारण उत्पन्न शोर का उन पर कोई प्रभाव नहीं हुआ। पहरे का समय खत्म होने पर सात्यकी ने बलराम को जगाया और स्वयं उसके स्थान पर सो गया। राक्षस लौटा और उसने बलराम को ललकारा। 

बलराम ने संघर्ष कर राक्षस को पराजित किया। अपना पहरा समाप्त कर बलराम ने श्रीकृष्ण को जगाया और स्वयं जाकर सो गए। श्रीकृष्ण ने अपना पहरा संभाला। राक्षस फिर आया और श्रीकृष्ण की ओर क्रोध से आगे बढ़ा। श्रीकृष्ण ने अपना मधुर-मनोहर मुख उसकी ओर मोड़ा और उस पर अपनी प्रेमभरी मुस्कान उड़ेल दी। उस मुस्कान ने राक्षस को निस्तेज कर दिया। मुस्कान के प्रभाव से उसकी प्रति हिंसा और विषाक्तता क्षीण होती चली गई। 

सार यह है कि क्रोध को क्रोध से नहीं जीता जा सकता। क्रोध को सहनशीलता से ही दबाया जा सकता है।