शिव ने ली गृहपति की परीक्षा


जब शिव ने ली गृहपति की परीक्षा
 


भगवान शंकर ने गृहपति के रूप में जन्म लिया। मुनि विश्वनार ने गृहपति को वेदों का अध्ययन करवाया। एक दिन देवर्षि नारद मुनि विश्वानर के यहां आए। नारदजी ने गृहपति का हाथ देखा तो कहा यह बालक तो बहुत भाग्यवान है लेकिन बारह वर्ष की आयु में इस पर कोई बड़ी विपत्ति आएगी। यह सुन गृहपति के माता-पिता गहरी चिंता में पड़ गए। माता-पिता की आज्ञा पर गृहपति ने काशी नगरी में जाकर सर्वहितकारी शिवलिंग की स्थापना की और कठिन तपस्या की। 

तपस्या के बारह वर्ष पूरे होने पर प्रसन्न हो देवराज इंद्र उसके पास आए लेकिन गृहपति ने अनजाने में इंद्र का तिरस्कार कर दिया, जिससे क्रोधित होकर इंद्र ने कुलिश उठा लिया, जिसे देख गृहपति मूच्र्छित हो गया। गृहपति को जब होश आया तो उसके सामने भगवान शिव खड़े थे। भगवान ने उसे बताया वे ही इंद्र का रूप लेकर उसकी परीक्षा लेने आए थे। भगवान शंकर ने गृहपति को अग्निपद का भागी, संपूर्ण देवों के लिए वरदाता होने और सभी प्राणियों में जठराग्नि रूप से विद्यमान रहने का वरदान दिया। साथ ही अग्निकोण का अधिपति भी बनाया। गृहपति द्वारा प्रतिष्ठापित शिवलिंग अग्निश्वर नाम से प्रसिद्ध है। इसकी पूजा करने वाले को विद्युत और अग्नि का भय नहीं होता।